Monthly Archives: June 2017

प्रतिस्पर्धामुक्त रहने ध्रुवीकरण से बचें

अजातशत्रु, सर्वस्पर्शी, हृदयसम्राट, लोकप्रिय, लोकनायक, लोकमान्य, पूजनीय आदि शब्द इतने अधिक भारी-भरकम हैं कि हर कोई इसे संभाल कर रख नहीं सकता और जिन लोगों के लिए बोले जाते हैं वे भी इसके काबिल नहीं होते क्योंकि इंसानों की पूरी की पूरी प्रजाति कभी पूर्ण दैवीय या पूर्ण आसुरी नहीं हो सकती। यह अनुपात कभी कम-ज्यादा हो  सकता है किन्तु सम्पूर्णता ... Read More »

कितने काम आते हैं हम औरों के लिए

हमारे जीवन का समग्र मूल्यांकन हमारी धन-सम्पदा, वैभव और पद-प्रतिष्ठा से नहीं होता बल्कि असली मूल्यांकन दूसरे लोग करते हैं। हम कितने ही महान और लोकप्रिय, अकूत धन-सम्पदा, भूमि और भवनों के मालिक हो जाएं या फिर कोई सी पदवियां पा लें, पुरस्कारों, अभिनंदनों और सम्मानों के ढेर लगा दें, किन्तु यह हमारे सच्चे इंसान होने के पैमाने नहीं हैं। ... Read More »

चलते रहें अपनी डगर

अपने वंश-परंपरागत आनुवंशिक संस्कारों, स्वभाव और चरित्र के अनुसार हर मनुष्य अपनी राह तलाश कर उस पर चलता रहता है। हर इंसान का यह मौलिक गुण होता है कि वह वही करता है जो उसकी कल्पनाओं में होता है। कल्पनाओं यह का संसार उसके पूर्वजन्म के संचित ज्ञान और अनुभवों का भी हो सकता है, आनुवंशिक भी हो सकता है ... Read More »

न बने रहें कछुआछाप खुदगर्ज

हम चाहे कितने सजग, व्यस्त और मस्त रहने के लिए जतन करते रहें मगर हम तब तक हमारे ध्येय की प्राप्ति नहीं कर पाएंगे जब तक कि हमारा आस-पास का माहौल और परिवेश खूबसूरत न हो,  ताजगी और सुकून से भरा न हो। परिवेश के अनुकूल होने की स्थिति में ही हम आनंद प्राप्त कर सकते हैं। चाहे वह आनंद ... Read More »

इन्हें भेंट न करें भगवान की तस्वीरें …

आजकल भगवान इतने सस्ते हो गए हैं कि कोई सा अतिथि कहीं से आ जाए, उसे खुश करने के लिए हम उपहार स्वरूप भगवान की तस्वीरें भेंट करने के आदी हो गए हैं। पर शाश्वत सत्य ही है कि जो लोग भ्रष्ट, रिश्वतखोर, बेईमान, लम्पट, अहंकारी और नुगरे हों उन्हें भगवान की तस्वीरें भेंट नहीं करनी चाहिए क्योंकि  जिन लोगों ... Read More »

लिया ही लिया है या कुछ दिया भी है

हम क्या हैं, क्या कर रहे हैं? इसके बारे में सब जानते हैं। हमें यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि हमारे करम किस तरह के रहे हैं या हम कैसे हैं। इसे वे सभी लोग अच्छी तरह जानते हैं जो हमारे आस-पास रहते हैं या हमें जानते हैं। इन लोगों के सामने हमें आँकने के बहुत सारे सटीक पैमाने ... Read More »

कृष्णार्पण करें मुक्त हो जाएँ

जब तक हम अपने अहंकार के बोझ के मारे दबे रहते हैं, ‘हम चौड़े और बाजार संकरा’ वाली स्थिति में जीते रहते हैं, अपने अलावा किसी और को कुछ नहीं मानते, अपने अधिकारों और शक्तियों का बेजा इस्तेमाल करते हैं, औरों पर धौंस जमाते हुए धींगामस्ती करते हैं, खुद तो चोरी-डकैती, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और व्यभिचारों में रमे रहते हैं और ... Read More »

हम सब असामाजिक हैं !

हम सारे लोग सामाजिक प्राणी की पहचान रखते हैं और कहे जाते हैं। लेकिन हमारे स्वभाव, लोक व्यवहार, रहन-सहन और जीवन जीने के रंग-ढंग को देख कर ईमानदारी से यदि सोचें और हमारी सामाजिकता के प्रतिशत का आत्म मूल्यांकन  करें तो हमें अपने आप पर शर्म ही आएगी क्योंकि हम जिस सामाजिकता और सामुदायिकता की बात करते हैं वह हमारे ... Read More »

आत्मघाती है यह मेहमानवाजी

आजकल सब तरफ चाय-नाश्ते का प्रचलन जीवन की अनिवार्यता की श्रेणी में आ चुका है। जहां जाएं वहाँ आतिथ्य सत्कार के नाम पर ड्राईंग रूम में सजी-धजी तरह-तरह की टी टेबल्स पर नाश्ता पहले से परोसा हुआ मिलता है नाश्ता करते हुए ही चर्चाओं का दौर जारी रहता है। कई लोग मन से खिलाते-पिलाते और आनंदित होते हैं। खूब सारे ... Read More »