Monthly Archives: April 2017

यह हमारी मातृभूमि है रैनबसेरा या सराय नहीं

यह देश हमारा है। न यह धर्मशाला है और न ही रैनबसेरा। न अजायबघर-चिड़ियाघर है, न मौज-मस्ती का डेरा। यह केवल भूभाग नहीं है बल्कि हमारी मातृभूमि है जिसके बारे में कहा गया है कि जननी-जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। यह स्वर्ग से भी बढ़कर है। यह भोग भूमि नहीं है बल्कि कर्म भूमि है जहाँ से श्रेष्ठ और यशस्वी कर्म करते ... Read More »

उसे आगे बढ़ाएँ जो पिछड़ा है

जो आगे चलता है उसकी जिम्मेदारी है कि सभी पीछे वालों का पूरा-पूरा ध्यान रखें। नेतृत्व करने वालों का सबसे पहला और अनिवार्य मौलिक गुण यही है कि वह उन सभी के हितों के बारे में चिन्तन करें जो कि उनके अनुचर, आश्रित या संरक्षित हैं। सच्चा और अच्छा नेतृत्वकर्ता वही हो सकता है जिसके लिए उसके पीछे-पीछे चलने वाले ... Read More »

अद्वितीय और अन्यतम बनें, न कि भीड़ का हिस्सा या भाड़े का आदमी

दो रास्ते हैं। एक है भेड़ों की रेवड़ या तमाशबीन भीड़ की तरह बने रहें और भीड़ को ही सर्वस्व मानकर जैसे आए थे वैसे ही चले जाएं। और दूसरा रास्ता है अपने आपको दूसरों से अलग और ऎसा अन्यतम बनाने की कोशिश करें कि दुनिया भर में अद्वितीय ही रहें। हमारे मुकाबले का कोई दूसरा इंसान हो ही नहीं ... Read More »

ठिकाने लगाएँ भिखारियों को

दान-पुण्य और धर्म के सहारे स्वर्ग और मोक्ष को तलाशने वाले हम लोगों के लिए भिखारियों का होना जरूरी है अन्यथा हम न तो स्वर्ग प्राप्त कर सकते हैं और न ही मोक्ष। भला हो इन किसम-किसम के भिखारियों का, जिनकी वजह से हमारे पुरखों ने मोक्ष पा लिया अथवा स्वर्ग का मैदान मार लिया। और हम भी कितने अधिक ... Read More »

दिमाग खराब है

आजकल किसी का कोई भरोसा नहीं रहा। न दिल और दिमाग का, न देह का। पता नहीं कब भटक कर राह बदल लें या सुप्तावस्था को प्राप्त कर लें। कभी भी कुछ भी हो सकता है इसलिए हमेशा तैयार रहें किसी भी प्रकार की परिस्थिति के लिए। कुछ भी सामने आ सकता है, किसी से भी आमना-सामना हो सकता है। ... Read More »

देवालय बनाएं अपनी देह को

  भगवान की ओर से प्राप्त मनुष्य देह अत्यन्त दुर्लभ है और यह बहुत मुश्किल से प्राप्त हो पाती है लेकिन हम अपनी देह के महत्व और मोल को पहचानते तक नहीं। यही कारण है कि हमारे पास देह के रूप में ईश्वरीय और दिव्य देवालय है किन्तु हम अनभिज्ञ हैं। हमारे जीवन की तमाम समस्याओं का एकमात्र यही कारण ... Read More »

दुष्टों को बर्दाश्त करना भी भ्रष्टाचार और देशद्रोह है

केवल पैसा खाना, कमीशनखोरी, हरामखोरी और रिश्वतखोरी ही भ्रष्टाचार नहीं है बल्कि जिन लोगों का आचार-विचार और व्यवहार भ्रष्ट हो गया हो, उन लोगों तथा उनकी हरकतों को बर्दाश्त करना भी अपने आप में किसी भ्रष्टाचार से कम नहीं है क्योंकि इनके कुकर्मों और षड़यंत्रों के कारण कहीं न कहीं सभी प्रकार की सामान्य और ख़ास व्यवस्थाओं में दुष्पभाव पड़ता ... Read More »

प्रयोगधर्मा बनें

औसत जिन्दगी जीने का कोई अर्थ नहीं है। यह अपने आप में जड़ता और पशुता है जिसे ओढ़कर हम ताजिन्दगी वैसे ही बने रहते हैं जैसे पहले थे। अपने होने का अर्थ तभी है जबकि हम कुछ नया कर पाएं जो समाज और देश सभी के लिए मंगलदायी और कल्याणकारी हो तथा जिसका फायदा आने वाली पीढ़ियाें तक में संचरित ... Read More »

हर चेहरे में दिखता है कोई न कोई जानवर

हमारा चेहरा केवल वर्तमान जन्म को ही प्रतिबिम्बित नहीं करता, बल्कि थोड़ी गंभीरता से सोचें तो हमारे कई जन्मों की छवि के दर्शन हम इसमें कर सकते हैं। हम जब निद्रावस्था, बेहाशी या अन्यमनस्क होते हैं तभी हमारी मूल इंसानी छवि दिखाई देती है अन्यथा हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी में हमारे कई-कई रूप देखने को मिलते हैं। उत्थापन से लेकर ... Read More »

चलते-फिरते मुर्दे

पता नहीं लोगों को क्या हो गया है, क्या होता जा रहा है। अधिकांश लोगों के चेहरे मुरझाए हुए मायूस हैं, शरीर या अत्यधिक मोटापे के कारण से भूसा भरे बोरा या बोरी जैसा होता जा रहा है अथवा इतना कृशकाय और मरियल कि हड्डियाँ दिखने लगी हैंं। असमय बुढ़ापा दिखने लगा है और आदमी बीमारियों का घर ही नज़र ... Read More »