Monthly Archives: March 2016

दीमक होती जा रही है किताबी पीढ़ी

हमें सिर्फ किताबों से ही मतलब है, दुनिया में और किसी से नहीं। हमें किताबें पढ़ना ही आता है उसके सिवा कुछ भी काम न हमारे घर वालों ने सिखाया है, न हमें आता और न हम कुछ कर पाने का माद्दा रखते हैं। हमसे कोई भी कुछ दूसरा काम नहीं करवा सकता, चाहे हमारी अपनी दिनचर्या से संबंधित हो, ... Read More »

इन अघोरियों को देखें

वह जमाना बहुत पुराना हो चला है जब गाँव से बाहर किसी शिवालय में या श्मशान भूमि पर ऎदी और अघोरियों को अपनी ही मस्ती में घूमते, राख में लौटने तथा भक्ष्य-अभक्ष्य खाते हुए देखा जा सकता था। बात बहुत पुरानी भी नहीं हैं, पचास के दशक से पहले तक ये नज़ारे आम हुआ करते थे। बढ़ती जनसंख्या और बस्तियों ... Read More »

नीयत साफ हो तभी नियति साथ

सारी उपासनाओं, साधनाओं और कर्मयोग का यही सार है कि जिसकी नीयत साफ है, भगवान उसी के साथ है। फिर जिसके साथ भगवान है उसे नियति भी हरसंभव सहयोग देती है। मनुष्य के जीवन में सफलता पाने के लिए मन का साफ होना पहली और अनिवार्य शर्त है। जो भी भजन-पूजन और आराधना की जाती है वह सबसे पहला काम ... Read More »

करिश्माई धावक से मुलाकात

रोजाना 70-80 किलोमीटर की दौड़ लगाकर कन्याकुमारी से श्रीनगर तक की यात्रा पर गतिमान दुनिया की  अद्भुत एवं अद्वितीय  हस्ती स्पिरिट ऑफ इण्डिया के प्रणेता आस्ट्रेलिया के सांसद एवं पूर्व मंत्री श्री पेट फार्मर से प्रभातकालीन मुलाकात। उनके साथ दौड़ लगाना भी रोमांचकारी रहा। Read More »

जरा परखें पाँव छूने वालों को

ज्यों-ज्यों आदमी के भीतर से आदमियत और मौलिक  इंसानी क्षमताएं खत्म  होती जा रही हैं वह औरों की शरण में पहुंच कर अपने आदमी होने के वजूद को जिन्दा रखने की हरचन्द कोशिशें करना चाहता  चाहता है और इसलिए वह उन सभी प्रकार की आदतों को अपनाने लगता है जो आदमी को सहारा देने के लिए बैसाखियों का काम करती ... Read More »

उपयोगी बनाएं इस भीड़ को

मजमा लगाना और मजमा लगाकर बैठना, तमाशा बनना और तमाशा बनाना-दिखाना आदमी की फितरत में शुमार हो चला है। हमारे यहां गली-कूंचों से लेकर महानगरों तक सर्कलों, रास्तों, चौराहों, तिराहों, डेरों, पाटों और सहज उपलब्ध सभी स्थानों पर बुद्धिजीवियों, अति-बुद्धिजीवियों, महा-बुद्धिजीवियों, चिन्तकों और विचारकों की विभिन्न श्रेणियां विद्यमान हैं जिनका एकसूत्री एजेण्डा जिन्दगी  भर चर्चाओं में रमे रहना ही है ... Read More »

मंगतों को नहीं, जरूरतमन्दों को दें

पूरा संसार लेन-देन पर टिका हुआ है। यों कहा जाए कि सृष्टि में जन्म का आधार ही पूर्वजन्म के हिसाब-किताब का परिणाम है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। संसार चक्र में जो फंसा हुआ है उसके लिए लेना-देना जीवन भर का ऎसा क्रम बना हुआ है कि उससे कोई बच नहीं सकता। राजा और रंक-फकीर, सभी को एक-दूसरों से काम ... Read More »

ऎसे लोग मरते हैं कुत्तों की मौत

हमारे जीवन में माता-पिता, गुरु और ईश्वर के बाद उन सभी लोगों और संस्थाओं के प्रति श्रद्धा और आदर-सम्मान का भाव होना जरूरी है जो हमारे लिए रोजी-रोटी का प्रबन्ध करते हैं। चाहे वह कोई आश्रयदाता, सेठ, मालिक हो या फिर सरकारी, अद्र्ध सरकारी या निजी संस्थान, विभाग अथवा कार्यालय। इन सभी के प्रति आत्मीय निष्ठा, वफादारी और इनसे जुड़ी ... Read More »

बोलें कम, लिखें ज्यादा

जो बोला जाता है उसे वर्तमान पीढ़ी का मात्र एक से पाँच फीसदी हिस्सा ही सुन पाता है और इनमें भी अस्सी फीसदी बातें भुला दी जाती हैं अथवा भूल जाते हैं। या फिर अपने काम ही नहीं होने की वजह से हम लोग उस पर कान नहीं धरते, बिना सुने ही सर हिलाते रहते हैं या हाँ जी- हाँ ... Read More »