आनंद से ईश्वर या ईश्वर से ही आनंद

अपना लक्ष्य ईश्वर और वैभवशाली जीवन है। उसकी तरफ ध्यान दो। बाकी सब रास्ता भटकाने वाले हैं । जो भक्ति, कर्म और ज्ञान तथा ईश्वर की ओर बढने के मार्ग को बाधित करता है वह मित्र, प्रेमी और आनंद देने वाला होकर भी हमारा परम शत्रु है। यह सत्य ही है। कोई हमें पकड़ता नहीं है। हम ही हैं जो खंभे को कसकर पकड़े हुए हैं और दोष दे रहे हैं दूसरों को । एक-एक दिन बीत रहा है और हम गंगा घाट के शैवालों और गुदगुदी घास का प्यार पाकर तटों पर ठहरे हुए हैं। दो रास्ते हैं संसार या ईश्वर। संसार को पकड़े रहोगे तब तक भगवान नहीं मिलने वाला। और भगवान को पाने का यत्न करोगे तो इंसान से आसक्ति छोड़नी ही पड़ेगी चाहे कोई कितना ही बड़ा प्रेमी क्यों न हो। या तो इंसान और संसार में ही परमात्मा की तलाश करो, इसके लिए निष्काम सेवा का मार्ग अपना लो। या फिर एकान्तसेवन का सहारा लेना आरंभ कर दो।