नवरात्रि पर विशेष – या देवी सर्वभूतेषु …

शक्ति उपासना और दैवीय ऊर्जा संचय का पर्व नवरात्रि अपने आप में वह सिद्ध काल है जब देवी मैया को प्रसन्न कर वह सब कुछ पाया जा सकता है जो कि मनोवांछित है। कोई से देव या देवी हों, उनकी उपासना का यही अर्थ और मर्म है कि हम अपने जीवन को उपास्य देव के अनुरूप ढालें और उन्होंने जो-जो ... Read More »

चिल्लाने वाली चिल्लर

आदमी की जात को न जाने क्या होता जा रहा है। सब तरफ आदमी जात पगलायी हुई दिखने और रहने लगी है। सब तरफ लगता है कि जैसे आंशिक, आधे या पूरे पागलों के डेरे हैं या फिर डेढ़ होशियार लोगों के। आदमी जन्म से ही खुराफाती और अशांतमना होता है। वह कभी चुप नहीं बैठ सकता, और न कभी ... Read More »

किस काम के ये गमगीन मुर्दाल

हर इंसान के लिए अपने-अपने निर्धारित कर्म, फर्ज और धर्म हैं जिनकी सीमाओं में रहकर हम इनका बेहतरी के साथ निर्वाह करते हुए जीवन को सफल बना सकते हैं। पर आजकल ऎसा हो नहीं रहा। होना यह चाहिए कि जो विषय हमसे संबंधित नहीं हैं, जिनसे हमारा कोई लेना-देना नहीं है, दूर-दूर का कोई रिश्ता नहीं है, उन विषयों के ... Read More »

करती है मौज, बेशर्मों की फौज

जिसे एक बार कोई बात कह दो, कोई प्रक्रिया बता दो, वह है इन्सान। जिसे हर बार किसी विषय या प्रक्रिया या निर्देश के बारे में बताने की जरूरत पड़े वह है पशु। और जिसे बार-बार कहा जाए, बताया जाए, फिर भी कुछ नहीं कर पाए, ढीठ सा पड़ा रहे और जानबूझकर समझने, सीखने या करने की कोशिश न करें ... Read More »

एकला चालो

अच्छाइयों और बुराइयों के वजूद में कहीं कोई समानता नहीं है। दोनों के गुणधर्म में पूरा का पूरा विरोधाभास देखने में आता है। जिस तरह धर्म और अधर्म, देवताओं और असुरों में जमीन-आसमान का अन्तर देखा जाता है ठीक उसी तरह बुरे और अच्छे, दुष्टों और सज्जनों में भारी अन्तर हमेशा रहता है। यही कारण है कि इन दोनों ही ... Read More »

यथार्थ पर हावी छद्म जिन्दगी

हम सब लोग वास्तविकताओं से मुँह मोड़कर या ता नकलची बंदर-भालुओं की जिन्दगी जी रहे हैं या फिर हर तरह से छद्म जिन्दगी को अपनाते हुए यथार्थ को भुला चुके हैं। हमारा छद्म, कुटिल और स्वार्थपूर्ण व्यवहार हर मामले में छलकने और झलकने लगा है। जो लोग हमारे सम्पर्क में आते हैं वे सभी लोग हमारे बारे में अच्छी तरह ... Read More »

सदा बदहवासी नंगे-भूखे नुगरे

इंसान चाहे तो सृष्टि के सभी जीवों, जड़-चेतन सभी तत्वों और परिवेश के प्रत्येक कारक से कुछ न कुछ सीख सकता है। सीखने की जो प्रक्रिया इंसान के समझदार होने के बाद से शुरू होती है वह पूरी जिन्दगी यों ही चलती रहती है। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया यदि बीच में कभी रुक जाए या किसी कारण से विराम पा ले ... Read More »

दुष्टों का दमन ही आज का युगधर्म

दुष्ट आत्माएं हर युग में पैदा होती हैं और सज्जनों को तंग करने का ही काम करती हैं। पुराने युगों में जो असुर हो चुके हैं वे ही दुष्ट आत्माएं नए-नए खोल और नामों से पैदा होती रहती हैं और दुनिया भर में  दुष्टताएं करती हुई अन्ततोगत्वा दुष्टताओं के नए-नए अनुभवों, नवाचारों और नई-नई आसुरी विधाओं का व्यवहारिक ज्ञान पाकर ... Read More »

बनाएँ अन्यतम पहचान

जब सब तरफ एक ही एक तरह की भीड़ ही भीड़ पसरी हुई हो तो ऎसे में अपने व्यक्तित्व को एक अलग ही पहचान देने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए ताकि हम भीड़ से अलग दिखें। भेड़ों की रेवड़ की तरह अंधानुकरण करने वाली पोंगापंथी भीड़ अपने आप में उस परंपरा की द्योतक है जिसमें हम केवल भीड़ का हिस्सा ... Read More »

जो अवधिपार, वो अभिशप्त

हर वस्तु और व्यक्ति से लेकर सांसारिक पदार्थ जगत की अपनी एक निश्चित आयु होती है जिसके बाद इनका कोई उपयोग नहीं रहता, ये नाकारा हो जाते हैं और या तो इनका रूपान्तरण होना जरूरी है अथवा पूर्ण संहार। हर विध्वंस नवीन सृजन की भूमिका रचता है और हर सृजन का अंत विध्वंस ही होता है। सृष्टि और संहार का ... Read More »